लेखक आर्य सागर तिलपता ग्रेटर नोएडा 🖋️
17वीं शताब्दी में बनाए गए इस पोर्ट्रेट को देखकर आप सोचेंगे यह कोई भारतीय संत सन्यासी है जो किसी ग्रंथ की हस्तलिखित प्रतिलिपि तैयार कर रहा है । यदि आप ऐसा सोचते हैं तो आप भी उसी भ्रम का शिकार हो रहे हैं जिसका शिकार 17वीं शताब्दी में केरल दक्षिण भारत के ब्राह्मण आदि हिंदू हुए।
यह पोर्ट्रेट है इटली में जन्मे भगोड़े अपराधी रॉबर्ट दी नोबलीस का , जिसे यूरोप की सोसाइटी ऑफ़ जीसस ने भारत में ईसाइयत के प्रचार के लिए भेजा था, दरअसल वास्कोडिगामा के भारत आने के बाद ही भारत में ईसाई पादरियों का आना शुरू हो गया था छल बल धन से दक्षिण में बड़े पैमाने पर अनुसूचित जनजातियों को ईसाई बनाया जा रहा था लेकिन दक्षिण के ज्ञान विज्ञान वैदिक शिक्षा के केंद्रो को संचालित करने वाला ब्राह्मण वर्ग फ्रांसिस जेवियर जैसे ईसाई प्रचारकों के झांसें में नहीं आ रही था, सब असफल हो रहे थे।
1606 में खास रणनीति के तहत रॉबर्ट दी नोवलिस मदुरै शहर में आता है जो उस समय वैदिक ज्ञान विज्ञान का केंद्र था। भगवा बाना धारण कर मस्तक पर चंदन का टीका लगा जनेऊ पहन वह अपना नया नाम दक्षिण के ब्राह्मणों को तत्व बोधज्ञ स्वामी बताता है वह कहता है वह सात समुंदर पार रोम से आया है वह ब्रह्मा का वंशज है रूम में भी 'रोमाका ब्राह्मण' बसते हैं। वह एक सड़े गले चमड़े पर संस्कृत में एक कूटचित दस्तावेज ब्राह्मणों को दिखाता है जिसमें यह लिखा होता है कि रोम के ब्राह्मण भारत के ब्राह्मणों से भी अधिक प्राचीन है। वह मांसाहार छोड़कर शुद्ध शाकाहार अपना लेता है कुछ ब्राह्मण उसके धोखे में आ जाते हैं और यही से वह दक्षिण भारत के इतिहास के सबसे सफल द्विज वर्ग के कन्वर्जन को अंजाम देता है। कुछ दिन बाद जब कुछ ब्राह्मणों को उसके चाल चलन पर शक होता है तो वह प्राचीन ग्रंथ की पांडुलिपि दिखाता है जिसे वह पांचवा वेद 'येसूरवेद' बताता है इसके बारे में वह कहता है यह पांचवा वेद केवल रोम में ही उपलब्ध है। अब यदि कोई रोम जाकर उसके दावे की पुष्टि करता तो इसमें भी एक बहुत बड़ी बांधा यह थी भारत में लंबे समय तक यह मान्यता बनी रही यह कह सकते हैं एक खराब रूढ़ी ने जन्म ले लिया मौर्य काल के पश्चात कि जो समुद्री यात्रा करेगा उसका धर्म भ्रष्ट हो जाएगा वह वैदिक भारत जिसका शासन पूरे भूगोल देश देशांतर पर चलता था बौद्ध काल के पश्चात धर्म भ्रष्ट होने की इस मिथ्या कल्पना के कारण भारत का सांस्कृतिक संबद्ध बौद्धिक पर्यटन की परंपरा अन्य भू - भागों से कट गया। भारत के वैदिक संन्यासी प्रचारक जब भारतीय उपमहाद्वीप में ही सिमट कर रह गए तब वहां भिन्न भिन्न समय में ईसाइयत इस्लाम जैसी विचारधारा का उदय हुआ ईसाई पादरियों ने इसी कमजोरी का फायदा उठाया। अकेले राबर्ट नोबलीबस वह उसके शिष्य पादरी सी०जी० बसचो जिसने अपना नाम वीर मुनि रखा उसने एक लाख से अधिक ब्राह्मणों का कन्वर्जन कराया। जब यह प्रभावशाली हो गए तो हजारों लोगों को अमानवीय यातना दी गई लोगों को जिंदा जलवाया गया।
इस दुनिया में यदि किसी को आसानी से मूर्ख बनाया जा सकता है तो वह हिंदू जाति ही है , जो अपने अतीत से कभी भी प्रेरणा नहीं लेती। आज झारखंड में यही हो रहा है झारखंड में ईसाई मिशनरी गिरजाघर नहीं बना रहे अपितु हिंदुओं के मंदिर की तरह यीशू का मंदिर बना रहे हैं जिससे वह यीशु का मंदिर कहकर प्रचारित करते हैं अब वह कन्वर्टेड लोगों का नामकरण ईसाई रीति पर नहीं रखते उनका मूल हिंदू नाम ही व्यवहार में लाते हैं जिससे लोगों को शक ना हो। आर्य समाज जैसा संगठन पूर्वोत्तर वह मध्य दक्षिण भारत में ईसाई धर्मांतरण के विरुद्ध यथासंभव प्रतिरोध प्रयास कर रहा है लेकिन धनाभाव के कारण इस कार्य में बहुत चुनौती है। 16वीं शताब्दी से लेकर आज तक कुछ नहीं बदला है इसी मिशनरी विदेशी शक्तियां नए-नए हथकंडे अपना रहे है, झारखंड जैसे राज्य की तो बात ही छोड़िए गुरुओं की भूमि पंजाब जिसमें आजादी के दौरान महज एक फीसदी ईसाई आबादी थी आज वहां 15 फ़ीसदी ईसाई आबादी है एशिया के सबसे बड़े गुरुद्वारे मंदिर नहीं सबसे बड़े गिरजाघर आज पंजाब में बना रहे हैं इतना ही नहीं पंजाब की सामाजिक व्यवस्था में मजबूत माने जाने वाली बिरादरी जट्ट सिक्ख व खत्री भी बड़े पैमाने पर कन्वर्टेड हो रहे हैं।
ऐसे ही यदि चलता रहा तो एक दिन हिंदू केवल पारसीयो की तरह कुछ लाख आबादी में सिमट जाएगा। ईसाईयत की तरह ठीक ऐसे ही इस्लाम भी भारत में दक्षिण के रास्ते अरब के व्यापारियों के माध्यम से आया था, उन्होंने भी सूफी संतों के भेष में ऐसे ही हथकंडे अपनाए थे हिंदू वहां भी धोखा खा गया था ।
लेखक आर्य सागर तिलपता ग्रेटर नोएडा
0 टिप्पणियाँ