समाजवादी चिंतक संस्थापक / अध्यक्ष, लोक शिक्षण अभियान ट्रस्ट
गाजियाबाद। भारत विभिन्न विचारधाराओं, भाषाओं बोलियों, संस्कृतियों धर्मों का देश है। इसी धर्मों में त्योहार मनाने की परंपरा है, इसके माध्यम से लोग एक दूसरे से मिलकर खुशियाँ बांटते हैं।
इसी क्रम में इस्लाम धर्म में ईदुल अजहा, बकरीद का त्यौहार बहुत ही महत्वपूर्ण, समाज को संदेश देने वाला है। यह त्याग और कुर्बानी का त्यौहार है, अल्लाह के प्रति सम्पूर्ण समर्पण का भाव सबसे प्रिय से प्रिय की कुर्बानी। अजहा का अर्थ ही होता है बलिदान, कुर्बानी, त्याग की भावना, हजरत इब्राहिम एक पैगम्बर थे। पैगम्बर का अर्थ सर्वशक्तिमान अल्लाह के पैगाम को जन-जन में पहुंचाना तथा समाज में प्रेम, सहयोग, सद्भाव और भाईचारा बढ़ाना, नैतिक आचरण करना, दूसरे के धन का अपहरण न करना नेक कमाई कर जीविका चलाना किसी को मन, वचन, कर्म से चोट न पहुंचाना।
अल्लाह ने अपने प्रिय पैगम्बर हजरत इब्राहिम का इम्तिहान इसलिए लेना चाहा कि क्या वह दूसरों से ज्यादा बलिदान और कुर्बानी करने का साहस रखते हैं, यह उसका अनुसरण भी करते हैं। सबसे प्रिय चीज कुर्बानी के लिए इब्राहिम से स्वप्न में मांगी, साधारण जनता की तरह हजरत इब्राहिम को पुत्र इस्माइल से अपार मुहब्बत थी क्योंकि वह उनकी इकलौती संतान थे, बेहद मुहब्बत के बाद भी हजरत इब्राहिम ने अपने प्रिय पुत्र की कुर्बानी करने का निर्णय किया। रास्ते में उन्हें उनके निर्णय को गलत ठहराने वाले शैतान मिले तथा की दुनिया में क्या कोई अपने पुत्र की कुर्बानी करता है जो तुम्हारे बेटे की शहादत करने जा रहे हो, यह तुम्हारा इकलौता पुत्र है इसकी कुर्बानी कर दोगे तुम्हारे सामने भविष्य में जीवन जीने का संकट पैदा हो जाएगा।
एक बार हजरत इब्राहिम विचलित हुए कि क्यों न किसी और की कुर्बानी कर दी जाए, लेकिन उन्होंने निर्णय करने में जरा सी देर न कर अपने प्रिय पुत्र की कुर्बानी करने का निर्णय कर आंख पर पट्टी बांध ली वह समझ गये थे कि अल्लाह की जागृति में मुझे जो स्वप्न देखा है वही कार्य करना चाहिए। बेटे का मोह त्याग दिया तथा बेटे की कुर्बानी दे दी लेकिन जब हजरत इब्राहिम ने पट्टी खोली तो देखकर आश्चर्य चकित रह गये बेटे के स्थान पर एक बकरा कुर्बान हुआ बेटा इस्माइल सही था इस त्यौहार को बकरीद इसलिए कहते हैं बकरा, ऊंट, भेड़ जिसकी भी कुर्बानी होती है उसे बहुत ही प्यार से लोग पालते हैं। जिस जानवर की कुर्बानी होती है उसके मांस का एक तिहाई हिस्सा समाज के कमजोर वर्गों में तथा एक तिहाई हिस्सा अपने मित्र, पड़ोसी, रिश्तेदारों में बांट दिया जाता है शेष भाग अपने घर के लिए रखते हैं।
इसलिए यह त्याग बलिदान, कुर्बानी का त्यौहार है जरूरत मंद की सेवा करना जिन पर ऋण, वस्त्र नहीं है उनकी मदद करना, मिल बांट कर खाना इस त्यौहार की विशेषता है। दूसरों की भलाई के लिए अपने प्रियतम प्रिय वस्तुओं का उपयोग करना इस त्यौहार से प्रेरणा मिलती है।
हम इस अवसर पर सभी भाई-बहनों महानुभावों और बच्चों को ईद-उल-अजहा की बधाई देते हुए कहना चाहते हैं कि हजरत इब्राहिम ने जो त्याग, तपस्या, बलिदान और कुर्बानी का संदेश दिया है दूसरों के हित में त्याग करने से हम पीछे नहीं हटेंगे, समाज में सद्भाव भाई-चारा सहयोग की भावना पैदा कर सामाजिक बुराइयों तथा धार्मिक पाखण्ड का त्याग करेंगे। शैतान के बहकावे में कभी नहीं आयेंगे, जो नफरत का वातावरण समाज में पैदा करते हैं उन्हें हतोत्साहित करेंगे, यह पर्व सरकार के दिशा निर्देश का पालन करते हुए मनाये। पुनः हार्दिक मुबारकबाद।
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