गुर्जर समाज की राजनीतिक स्थिति पर गंभीरता से विचार करने का समय आ चुका है। आज देशभर में समाज से जुड़े सैकड़ों राजनीतिक चेहरे सक्रिय हैं, लेकिन विडंबना यह है कि उनकी राजनीति अक्सर व्यक्तिगत स्वार्थ, दलगत निष्ठा और अवसरवाद के इर्द-गिर्द घूमती नजर आती है। परिणामस्वरूप समाज एकजुट दिशा में आगे बढ़ने के बजाय बिखराव और भ्रम का शिकार होता जा रहा है।
सबसे बड़ी समस्या नेतृत्व की विश्वसनीयता को लेकर है। कई नेता अपनी-अपनी राजनीतिक पार्टियों को समाज के लिए हितकारी और कल्याणकारी बताने में पीछे नहीं रहते, लेकिन जैसे ही वे दल बदलते हैं, उनकी विचारधारा भी बदल जाती है। कल तक जिस पार्टी और नेतृत्व को वे समाज का उद्धारक बताते थे, आज उसी के खिलाफ खड़े हो जाते हैं। इससे आम समाज में भ्रम की स्थिति पैदा होती है और विश्वास कमजोर होता है।
राजनीतिक दलों का रवैया भी कम जिम्मेदार नहीं है। सत्ता से बाहर रहते समय ये दल समाज की संख्या और शक्ति का भरपूर उपयोग करते हैं, लेकिन जैसे ही सत्ता मिलती है, भागीदारी और प्रतिनिधित्व के मामले में समाज को पीछे कर दिया जाता है। कैबिनेट और नीतिगत फैसलों में उचित हिस्सेदारी नहीं मिलना इस असंतुलन को साफ दर्शाता है। यह स्थिति किसी भी जागरूक समाज के लिए चिंता का विषय होनी चाहिए।
पिछले कई दशकों में समाज का नेतृत्व बार-बार दल, विचार और निष्ठा बदलता रहा है। झंडे, नारे और प्रतीक बदलते रहे, लेकिन जमीनी स्तर पर न तो कोई ठोस राजनीतिक ढांचा तैयार हुआ और न ही दीर्घकालिक रणनीति बनी। राजनीतिक दल बनाने के प्रयास भी हुए, लेकिन उन्हें मजबूत संगठन, प्रशिक्षित कैडर और स्पष्ट दृष्टिकोण के अभाव में सफलता नहीं मिल सकी। केवल चुनावी टिकटों के वितरण पर आधारित राजनीति लंबे समय तक टिकाऊ नहीं हो सकती।
एक और गंभीर पहलू यह है कि समाज के भीतर ही कुछ प्रभावशाली और संसाधन-संपन्न लोग राजनीतिक अवसरों पर अपना वर्चस्व बनाए रखते हैं। इससे नए, शिक्षित और विचारशील लोगों को आगे आने का अवसर नहीं मिल पाता। यदि नेतृत्व सीमित दायरे में ही सिमटा रहेगा, तो व्यापक सामाजिक विकास की उम्मीद करना कठिन है।
अब आवश्यकता है आत्ममंथन की। समाज को यह तय करना होगा कि वह केवल चुनावी उपयोग का साधन बना रहेगा या एक संगठित, जागरूक और रणनीतिक शक्ति के रूप में उभरेगा। इसके लिए स्थायी नेतृत्व, स्पष्ट नीति, युवा भागीदारी और वैचारिक मजबूती जरूरी है।
समय आ गया है कि समाज अपने राजनीतिक भविष्य को लेकर गंभीरता से सोचे, सही नेतृत्व को पहचाने और दीर्घकालिक हितों को प्राथमिकता दे। तभी वास्तविक सशक्तिकरण संभव हो पाएगा।
लेखक - जय कुमार गुर्जर
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