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संविधान के प्रथम संशोधन की आज भी प्रासंगिकता बरकरार : न्यायमूर्ति अनीश कुमार गुप्ता

मनोज तोमर ब्यूरो चीफ राष्ट्रीय दैनिक फ्यूचर लाईन टाइम्स गौतमबुद्ध नगर।
नोएडा/प्रयागराज, 16 जून। अधिवक्ता परिषद उत्तर प्रदेश-उत्तराखंड द्वारा सोमवार सायं आयोजित ऑनलाइन व्याख्यानमाला में संविधान के प्रथम संशोधन की 75वीं वर्षगांठ के परिप्रेक्ष्य में उसकी वर्तमान उपयोगिता पर विस्तृत चर्चा की गई। कार्यक्रम में इलाहाबाद उच्च न्यायालय के माननीय न्यायमूर्ति अनीश कुमार गुप्ता ने मुख्य वक्ता के रूप में संबोधित करते हुए कहा कि संविधान लागू होने के मात्र 16 माह बाद प्रथम संशोधन की आवश्यकता पड़ना उस समय की संवैधानिक चुनौतियों का प्रमाण था।
उन्होंने कहा कि वर्ष 1950 में उच्चतम न्यायालय द्वारा दिए गए बृजभूषण बनाम दिल्ली राज्य तथा रमेश थापर बनाम मद्रास राज्य के ऐतिहासिक निर्णयों ने प्रथम संविधान संशोधन की आधारभूमि तैयार की। इन निर्णयों में अभिव्यक्ति एवं प्रेस की स्वतंत्रता को विशेष संरक्षण प्रदान किया गया था। न्यायमूर्ति गुप्ता ने बताया कि प्रथम संशोधन के माध्यम से मूल अधिकारों पर युक्तिसंगत प्रतिबंधों की व्यवस्था की गई तथा अनुच्छेद 31क एवं 31ख जोड़कर भूमि सुधार और जमींदारी उन्मूलन का मार्ग प्रशस्त किया गया।
उन्होंने शंकरी प्रसाद, सज्जन सिंह, गोलकनाथ तथा केशवानंद भारती जैसे महत्वपूर्ण मामलों का उल्लेख करते हुए संविधान संशोधन और न्यायिक समीक्षा के विकासक्रम को स्पष्ट किया। उन्होंने कहा कि वर्तमान समय में बढ़ते हेट स्पीच के मामलों और सामाजिक चुनौतियों को देखते हुए प्रथम संविधान संशोधन की प्रासंगिकता आज भी बनी हुई है।
कार्यक्रम का संचालन उत्तराखंड उच्च न्यायालय के अधिवक्ता अनिल जोशी ने किया। व्याख्यान के दौरान प्रतिभागियों द्वारा पूछे गए प्रश्नों का न्यायमूर्ति गुप्ता ने विस्तार से उत्तर दिया। अधिवक्ता परिषद द्वारा पूर्व में भी ऐसी व्याख्यानमालाओं का सफल आयोजन किया जा चुका है।
इस अवसर पर गौतमबुद्ध नगर से अमित शर्मा, नितिन त्यागी, सुरेश चंद, अनुराग त्यागी, प्रेम सिंह, अजेय कुमार, रविंद्र भाटी, कपिल नागर, गजेंद्र चौहान, दीपक शर्मा, अमित प्रभात नागर, जयेन्द्र दुबे, विवेक शर्मा सहित सैकड़ों अधिवक्ताओं ने सक्रिय सहभागिता की।

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