-->

रास्तों से भटकते किसान और सामाजिक संगठन : पद की राजनीति में खोता असली उद्देश्य!

लेखक : ओमवीर सिंह आर्य, एडवोकेट एवं वरिष्ठ सामाजिक कार्यकर्ता
गौतमबुद्ध नगर सहित देश के कई जिलों में पिछले कुछ वर्षों से किसान और सामाजिक संगठनों के गठन की एक नई लहर देखने को मिल रही है। लगभग हर कस्बे और गांव में कोई न कोई नया संगठन बनता दिखाई देता है। कागजों पर ये संगठन किसानों, मजदूरों और समाज के वंचित वर्गों की आवाज बनने का दावा करते हैं, लेकिन हकीकत यह है कि इनमें से अधिकतर संगठन अपने मूल उद्देश्य से भटकते जा रहे हैं। जनहित और किसानों के अधिकारों की लड़ाई की जगह अब पद, प्रतिष्ठा और व्यक्तिगत पहचान की राजनीति हावी होती नजर आ रही है।
जिले में सैकड़ों किसान और सामाजिक संगठन पंजीकृत हैं। हर संगठन में राष्ट्रीय अध्यक्ष, प्रदेश अध्यक्ष, जिलाध्यक्ष, महासचिव और दर्जनों पदाधिकारी होते हैं। लेकिन जब किसानों की वास्तविक समस्याओं की बात आती है, तो इन संगठनों की सक्रियता बहुत कम दिखाई देती है। किसानों को उनकी फसल का उचित मूल्य नहीं मिल रहा, खेती की लागत लगातार बढ़ रही है, बिजली-पानी की समस्याएं बनी हुई हैं और युवाओं के सामने रोजगार का संकट है, लेकिन इन मुद्दों पर संगठनों की आवाज अक्सर कमजोर या नदारद रहती है।
वास्तविकता यह है कि आज कई संगठन केवल फोटो खिंचवाने, सोशल मीडिया पर पोस्ट डालने और कार्यक्रमों में अपनी मौजूदगी दर्ज कराने तक सीमित होकर रह गए हैं। कुछ लोग दस-बीस परिचितों को जोड़कर संगठन बना लेते हैं और खुद को राष्ट्रीय अध्यक्ष या जिलाध्यक्ष घोषित कर देते हैं। इसके बाद संगठन का उपयोग जनसेवा के बजाय व्यक्तिगत पहचान बनाने और राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं को पूरा करने के लिए किया जाता है।
सबसे चिंताजनक स्थिति यह है कि कई तथाकथित किसान नेता केवल टोल प्लाजा, प्राधिकरण कार्यालयों या प्रशासनिक दफ्तरों के बाहर प्रदर्शन करके खुद को बड़ा नेता साबित करने की कोशिश करते हैं। लेकिन जब किसानों की जमीन अधिग्रहण, मुआवजे, सिंचाई, बीज और खाद की समस्याओं पर गंभीर लड़ाई लड़ने की बात आती है, तब यही नेता कहीं दिखाई नहीं देते। कई बार आंदोलन केवल मीडिया में सुर्खियां बटोरने और प्रशासन पर दबाव बनाकर व्यक्तिगत लाभ लेने का माध्यम बन जाते हैं।
इतिहास गवाह है कि जब किसान और सामाजिक संगठन ईमानदारी से काम करते हैं, तो वे समाज में बड़े बदलाव ला सकते हैं। किसानों के अधिकारों की रक्षा, सामाजिक कुरीतियों के खिलाफ आवाज उठाना, शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे मुद्दों पर जागरूकता फैलाना—ये सब संगठन की जिम्मेदारी होती है। लेकिन जब संगठन केवल पद और प्रतिष्ठा का मंच बन जाएं, तो उनका असली उद्देश्य कमजोर पड़ जाता है और जनता का विश्वास भी धीरे-धीरे खत्म होने लगता है।
गौतमबुद्ध नगर जैसे तेजी से विकसित हो रहे जिले में किसानों की समस्याएं कम नहीं हैं। जमीन अधिग्रहण, उचित मुआवजा, रोजगार, शिक्षा, पर्यावरण और बुनियादी सुविधाओं जैसे कई मुद्दे आज भी समाधान की प्रतीक्षा कर रहे हैं। ऐसे समय में किसान संगठनों की जिम्मेदारी और भी बढ़ जाती है कि वे किसानों की आवाज को मजबूती से प्रशासन और सरकार तक पहुंचाएं। लेकिन दुर्भाग्य यह है कि कई संगठन इन महत्वपूर्ण मुद्दों को छोड़कर केवल अपनी मौजूदगी दिखाने तक सीमित रह जाते हैं।
जरूरत इस बात की है कि संगठन बनाने वाले लोग आत्ममंथन करें। उन्हें यह तय करना होगा कि उनका उद्देश्य केवल पद प्राप्त करना है या वास्तव में किसानों और समाज के लिए कुछ सकारात्मक बदलाव लाना है। संगठन का असली मूल्य उसके पदों या पदाधिकारियों की संख्या से नहीं, बल्कि उसके कार्यों और समाज पर पड़े उसके प्रभाव से तय होता है।
यदि किसान और सामाजिक संगठन ईमानदारी और पारदर्शिता के साथ काम करें, तो वे किसानों की समस्याओं का समाधान निकालने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। वे प्रशासन और जनता के बीच एक मजबूत सेतु बन सकते हैं। शिक्षा, पर्यावरण संरक्षण, किसानों के अधिकार, युवाओं के रोजगार और सामाजिक न्याय जैसे कई क्षेत्रों में संगठन सकारात्मक बदलाव ला सकते हैं।
आज समय की मांग है कि किसान और सामाजिक संगठन दिखावे की राजनीति और व्यक्तिगत स्वार्थ से ऊपर उठें। उन्हें जनहित को सर्वोपरि रखते हुए किसानों और समाज की वास्तविक समस्याओं के समाधान के लिए काम करना होगा। तभी ये संगठन अपनी विश्वसनीयता बचा पाएंगे और समाज में अपनी सार्थक भूमिका निभा सकेंगे।
सच्चाई यही है कि संगठन की पहचान उसके पदों से नहीं, बल्कि उसके कर्मों से बनती है। यदि संगठन सही दिशा में कार्य करेंगे तो न केवल किसानों की आवाज बुलंद होगी, बल्कि समाज और देश की प्रगति की राह भी मजबूत होगी।

एक टिप्पणी भेजें

0 टिप्पणियाँ