— आनंद जी, सह प्रांत प्रचारक (मेरठ प्रांत)
भारत केवल एक भौगोलिक इकाई नहीं, बल्कि हजारों वर्षों से चली आ रही एक महान सांस्कृतिक परंपरा का जीवंत स्वरूप है। इस देश की आत्मा उसकी संस्कृति, ज्ञान परंपरा और समाज की एकात्म भावना में बसती है। जब हम भारत के इतिहास को देखते हैं तो स्पष्ट होता है कि यह भूमि विश्व को ज्ञान, विज्ञान, अध्यात्म और जीवन मूल्यों की दिशा देने वाली रही है।
आज जब राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ अपने शताब्दी वर्ष की ओर बढ़ रहा है, तब यह अवसर केवल संगठन के विस्तार का नहीं, बल्कि उस विचार की यात्रा का भी है जिसने समाज को संगठित करने और राष्ट्र को सशक्त बनाने का कार्य किया है। संघ की यह यात्रा वास्तव में “शून्य से शतक की यात्रा” है, जो एक छोटे से प्रयास से प्रारंभ होकर आज विशाल वटवृक्ष के रूप में विकसित हो चुकी है।
अक्सर संघ के बारे में अनेक प्रकार की धारणाएं और भ्रम समाज में फैलाए जाते हैं। कुछ लोग कहते हैं कि संघ राजनीति करता है, तो कुछ यह भी आरोप लगाते हैं कि यह किसी वर्ग विशेष के विरोध में कार्य करता है। लेकिन वास्तविकता इससे बिल्कुल अलग है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का मूल उद्देश्य राजनीति नहीं, बल्कि समाज के भीतर चरित्रवान, अनुशासित और राष्ट्रभक्त व्यक्तियों का निर्माण करना है।
भारत की सभ्यता अत्यंत प्राचीन और गौरवशाली रही है। हमारे ग्रंथों और परंपराओं में ज्ञान का अद्भुत भंडार मिलता है। रामायण और महाभारत जैसे महाकाव्य केवल धार्मिक ग्रंथ नहीं, बल्कि समाज और जीवन के मार्गदर्शक भी हैं। भगवान राम ने उत्तर से दक्षिण तक भारत को जोड़ने का कार्य किया, वहीं भगवान कृष्ण ने धर्म और नीति का संदेश देते हुए समाज को दिशा दी। भगवान शिव का प्रभाव हिमालय से लेकर पूरे भारत में दिखाई देता है। इन तीनों महान व्यक्तित्वों ने भारत को सांस्कृतिक और आध्यात्मिक रूप से एक सूत्र में बांधने का कार्य किया।
भारत की ज्ञान परंपरा इतनी समृद्ध रही है कि नालंदा और तक्षशिला जैसे विश्वविद्यालयों में दूर-दूर से विद्यार्थी शिक्षा प्राप्त करने आते थे। आयुर्वेद के आचार्य चरक और सुश्रुत, गणित और खगोल विज्ञान के विद्वान आर्यभट्ट और भास्कराचार्य जैसे महान विद्वानों ने विश्व को नई दिशा दी। यह सब उस समय हुआ जब दुनिया के कई हिस्सों में सभ्यता का प्रारंभिक विकास भी नहीं हुआ था।
इतिहास में भारत ने अनेक आक्रमणों और चुनौतियों का सामना किया। विदेशी आक्रांताओं ने हमारे मंदिरों, विश्वविद्यालयों और सांस्कृतिक प्रतीकों को नष्ट करने का प्रयास किया। सोमनाथ मंदिर जैसे समृद्ध धार्मिक स्थलों पर भी कई बार आक्रमण हुए। लेकिन इन सबके बावजूद भारत की आत्मा कभी पराजित नहीं हुई। समाज की आंतरिक शक्ति और सांस्कृतिक मूल्यों ने हमेशा उसे फिर से खड़ा किया।
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना ऐसे ही समय में हुई जब समाज को संगठित करने की आवश्यकता महसूस की जा रही थी। संघ के संस्थापक डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार ने यह समझ लिया था कि केवल राजनीतिक स्वतंत्रता पर्याप्त नहीं होगी। यदि समाज संगठित और चरित्रवान नहीं होगा, तो स्वतंत्रता भी स्थायी नहीं रह पाएगी।
डॉ. हेडगेवार का जीवन त्याग और राष्ट्रभक्ति का अद्भुत उदाहरण है। अंग्रेजी शासन के समय “वंदे मातरम्” का उद्घोष करना भी अपराध माना जाता था। उस समय उन्होंने विद्यालय में वंदे मातरम् का नारा लगाकर राष्ट्रभक्ति का संदेश दिया और इसके कारण उन्हें विद्यालय से निष्कासित भी होना पड़ा। बाद में उन्होंने चिकित्सा की पढ़ाई की, लेकिन अपना जीवन राष्ट्र सेवा के लिए समर्पित कर दिया।
संघ की शाखा व्यवस्था का उद्देश्य केवल शारीरिक अभ्यास कराना नहीं है, बल्कि समाज में अनुशासन, सहयोग और राष्ट्रीय चेतना का विकास करना है। शाखा के माध्यम से स्वयंसेवक एक दूसरे से जुड़ते हैं और समाज सेवा के कार्यों में सक्रिय भागीदारी निभाते हैं। आज देशभर में हजारों सेवा कार्य चल रहे हैं, जिनमें शिक्षा, स्वास्थ्य, ग्रामीण विकास और आपदा राहत जैसे अनेक क्षेत्र शामिल हैं।
शिक्षा के क्षेत्र में विद्या भारती के अंतर्गत हजारों विद्यालय संचालित हो रहे हैं, जहां लाखों विद्यार्थी भारतीय संस्कृति और आधुनिक ज्ञान का समन्वय सीख रहे हैं। इसके अलावा अनेक सामाजिक और सेवा संस्थाएं भी समाज के विभिन्न क्षेत्रों में कार्य कर रही हैं।
आज देशभर में लगभग 85 हजार से अधिक शाखाएं नियमित रूप से संचालित हो रही हैं और लाखों स्वयंसेवक राष्ट्र सेवा के कार्यों में लगे हुए हैं। यह सब किसी व्यक्तिगत स्वार्थ या राजनीतिक लाभ के लिए नहीं, बल्कि राष्ट्र के प्रति समर्पण और सेवा भावना के कारण संभव हो पाया है।
संघ का अंतिम लक्ष्य केवल अधिकारों की चर्चा करना नहीं है। अधिकारों के साथ-साथ समाज को अपने कर्तव्यों के प्रति भी जागरूक होना चाहिए। जब प्रत्येक नागरिक अपने कर्तव्य का पालन करेगा, तभी राष्ट्र सशक्त और समृद्ध बन सकेगा।
आज आवश्यकता इस बात की है कि हम अपने इतिहास, संस्कृति और मूल्यों को समझें और समाज को संगठित करने के प्रयासों में सक्रिय भूमिका निभाएं। भारत ने अतीत में विश्व को दिशा दी है, वर्तमान में भी दे रहा है और भविष्य में भी अवश्य देगा।
जब समाज संगठित होगा, जब प्रत्येक व्यक्ति अपने कर्तव्य को समझेगा और जब राष्ट्रहित को सर्वोपरि माना जाएगा, तब भारत पुनः विश्व में नेतृत्व करने की अपनी स्वाभाविक भूमिका निभाएगा। यही संघ का लक्ष्य है और यही हमारे राष्ट्र का उज्ज्वल भविष्य भी। 🇮🇳
0 टिप्पणियाँ