28 फ़रवरी 2026 को पश्चिम एशिया में तनाव अचानक अत्यधिक बढ़ गया, जब संयुक्त राज्य अमेरिका और इज़राइल द्वारा ईरान के विरुद्ध समन्वित सैन्य कार्रवाई की खबरें सामने आईं। इन हमलों का लक्ष्य ईरान के प्रमुख राजनीतिक और सामरिक केंद्र बताए गए। रिपोर्टों के अनुसार ईरान के सर्वोच्च नेता Ali Khamenei तथा इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (IRGC) के कई वरिष्ठ कमांडरों सहित उच्च पदस्थ अधिकारियों को निशाना बनाया गया।
इन घटनाओं के बाद ईरान में नेतृत्व परिवर्तन तेज़ी से हुआ और Mojtaba Khamenei को आपात राजनीतिक व्यवस्था के अंतर्गत नया सर्वोच्च नेता घोषित किया गया। इस परिवर्तन ने पहले से चल रहे क्षेत्रीय तनाव को और अधिक गंभीर बना दिया।
इसके प्रत्युत्तर में ईरान ने इज़राइल तथा खाड़ी क्षेत्र के कई अमेरिकी सहयोगी देशों — Saudi Arabia, United Arab Emirates, Bahrain और Qatar — पर मिसाइल और ड्रोन हमले किए, जहाँ अमेरिकी सैन्य ठिकाने स्थित हैं। इसके बाद से दोनों पक्षों के बीच लगातार सैन्य गतिविधियाँ जारी हैं, जिससे पूरे क्षेत्र में अस्थिरता और अनिश्चितता का वातावरण बना हुआ है।
युद्ध की पृष्ठभूमि
इस संघर्ष की जड़ें आंशिक रूप से ईरान की आंतरिक परिस्थितियों से भी जुड़ी हैं। जनवरी 2026 में राजधानी Tehran सहित कई शहरों में व्यापक विरोध-प्रदर्शन शुरू हुए। इन प्रदर्शनों के पीछे महँगाई, बेरोज़गारी, आर्थिक प्रतिबंधों का दबाव और शासन व्यवस्था के प्रति असंतोष जैसे कारण प्रमुख थे।
प्रदर्शनकारियों और सुरक्षा बलों के बीच झड़पों में बड़ी संख्या में लोगों की मृत्यु होने की खबरें सामने आईं। इन घटनाओं ने ईरान के भीतर सामाजिक-राजनीतिक विभाजन को उजागर किया और शासन की वैधता को चुनौती दी। प्रारंभ में आर्थिक मुद्दों से शुरू हुआ आंदोलन धीरे-धीरे राजनीतिक सुधारों और शासन में अधिक जनभागीदारी की मांग में बदल गया।
संयुक्त राज्य अमेरिका ने इन प्रदर्शनों के प्रति समर्थन व्यक्त किया और इसे “जनता का आंदोलन” बताया। वहीं इज़राइल लंबे समय से ईरान के परमाणु कार्यक्रम और सैन्य क्षमताओं को अपनी सुरक्षा के लिए खतरा मानता रहा है। इसी कारण दोनों देशों ने मिलकर ईरान के नेतृत्व ढांचे को कमजोर करने और उसके क्षेत्रीय प्रभाव को सीमित करने की रणनीति अपनाई। परिणामस्वरूप आंतरिक अस्थिरता धीरे-धीरे अंतरराष्ट्रीय सैन्य टकराव में परिवर्तित हो गई।
वैश्विक अर्थव्यवस्था पर प्रभाव
इस संघर्ष का सबसे बड़ा प्रभाव ऊर्जा बाजार पर पड़ा है। ईरान ने Strait of Hormuz में आवाजाही को सीमित करने की घोषणा की, जो विश्व के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री मार्गों में से एक है। वैश्विक कच्चे तेल के व्यापार का लगभग पाँचवाँ भाग इसी मार्ग से होकर गुजरता है।
इस व्यवधान के कारण अंतरराष्ट्रीय तेल कीमतों में तेज़ वृद्धि हुई, जिससे ऊर्जा लागत, परिवहन व्यय और उत्पादन लागत बढ़ गई। परिणामस्वरूप कई देशों में महँगाई का दबाव बढ़ा और वैश्विक वित्तीय बाज़ारों में अस्थिरता देखी गई। शिपिंग बीमा दरों और परिवहन लागत में वृद्धि से अंतरराष्ट्रीय व्यापार भी प्रभावित हुआ।
भारत पर प्रभाव
यह संघर्ष भारत के लिए भी अनेक चुनौतियाँ प्रस्तुत करता है। भारत अपनी ऊर्जा आवश्यकताओं के लिए पश्चिम एशिया पर काफी निर्भर है और बड़ी मात्रा में कच्चा तेल तथा एलपीजी इसी क्षेत्र से आयात करता है। इसलिए तेल आपूर्ति में व्यवधान और कीमतों में वृद्धि भारतीय अर्थव्यवस्था पर प्रत्यक्ष प्रभाव डालती है।
इसके अतिरिक्त लगभग 90 लाख भारतीय नागरिक पश्चिम एशिया के विभिन्न देशों में कार्यरत हैं, जिनकी भेजी गई धनराशि (रेमिटेंस) भारत की अर्थव्यवस्था और विदेशी मुद्रा भंडार के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। यदि संघर्ष लंबा खिंचता है तो वहाँ रहने वाले भारतीयों की सुरक्षा, रोजगार और आय पर भी असर पड़ सकता है। इसलिए भारत के सामने अपने नागरिकों की सुरक्षा सुनिश्चित करने, ऊर्जा स्रोतों का विविधीकरण करने तथा संतुलित कूटनीतिक नीति अपनाने की आवश्यकता है।
इतिहास से रणनीतिक सीख
यह संघर्ष एक महत्वपूर्ण प्रश्न को फिर से सामने लाता है—क्या बाहरी सैन्य हस्तक्षेप द्वारा किसी देश में शासन परिवर्तन स्थायी स्थिरता ला सकता है? हाल के इतिहास में Afghanistan, Iraq और Libya के उदाहरण बताते हैं कि बाहरी हस्तक्षेप कई बार दीर्घकालिक अस्थिरता और आंतरिक संघर्ष को जन्म देता है।
इन अनुभवों से स्पष्ट होता है कि सैन्य दबाव से राजनीतिक परिवर्तन तो संभव है, परंतु स्थायी शांति और संस्थागत स्थिरता सुनिश्चित करना अत्यंत कठिन होता है। इसलिए दीर्घकालिक समाधान के लिए कूटनीति, संवाद और क्षेत्रीय सहयोग अधिक प्रभावी साधन सिद्ध हो सकते हैं।
लेखक कुनाल नागर।
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