मुंबई/नई दिल्ली: महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव परिणामों के बाद हिन्दी–विरोधी राजनीति पर नई बहस छिड़ गई है। चुनावी विश्लेषकों का मानना है कि भाषाई ध्रुवीकरण पर आधारित रणनीति इस बार अपेक्षित प्रभाव नहीं छोड़ सकी, वहीं दूसरी ओर हिन्दी समर्थक वर्ग में इसे बड़ी वैचारिक जीत के रूप में देखा जा रहा है।
चुनाव परिणामों के बाद जाने-माने विद्वान और शिक्षाविद् प्रोफ़ेसर महावीर ने इस मुद्दे पर खुलकर प्रतिक्रिया दी। उनका कहना है कि “महाराष्ट्र में हिन्दी-विरोध का कोई स्थायी आधार नहीं है। मराठी और हिन्दी दोनों देवनागरी लिपि साझा करती हैं और दोनों के बीच सांस्कृतिक व भाषाई निकटता है।” उन्होंने दावा किया कि मतदाताओं ने इस बार इसे स्पष्ट रूप से दर्ज किया है।
प्रोफ़ेसर महावीर ने यह भी सवाल उठाया कि जो दल हिन्दी को लेकर विरोध दर्ज करते हैं, वे अंग्रेज़ी माध्यम शिक्षा में मराठी एवं भारतीय भाषाओं के रोके जाने पर प्रायः चुप रहते हैं। उनके अनुसार “अबोध बच्चों पर अंग्रेज़ी थोपने पर सवाल कम उठते हैं, पर हिन्दी पर आपत्तियाँ अधिक की जाती हैं, जनता इस विरोधाभास को समझ रही है।”
उन्होंने आगे यह भी कहा कि भाषा भारतीय एकता का सूत्र है और आने वाले समय में तमिलनाडु व बंगाल जैसे राज्यों में भी भाषाई टकराव के बजाय भाषाई सहयोग की मांग बढ़ेगी।
अंत में प्रोफ़ेसर महावीर ने अपने वक्तव्य को नारे के साथ समाप्त किया:
“जयहिन्द – जयहिन्दी; हिन्दी भारत माँ के मस्तक की बिन्दी।”
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