दीपावली पर देव दयानंद निर्वाण दिवस पर स्मरण

कौन था यह व्यक्ति ? डॉ विवेक आर्य


"१८८३ ई० का दीपावली का दिवस । अजमेर नगरी की भिनाय कोठी के कमरे के कक्ष में शय्या पर लेटा एक व्यक्ति जीवन की अन्तिम श्वासों से संघर्ष कर रहा था । वह व्यक्ति तूफानों से जूझते-जूझते स्वयं एक तूफान हो गया था । सहस्रों वर्षों की रूढ़ियों और अन्धविश्वासों से ग्रस्त मानवता को संजीवित करने के लिए उसने एक थपेड़ दी । जनता तिलमिला उठी । निद्रा से मूर्च्छित-सा पड़ा जन समूह नींद से जगाने वाले के प्रति तीखी आँखों से देखने लगा । सब उसके विरोधी हो गए - देशी भी, विदेशी भी, अपने भी और पराए भी, आस्तिक भी और नास्तिक भी । सबने मिलकर षड्यन्त्र रचा । वे पहचान न पाए उस व्यक्ति को जो उनके लिए ही जूझा था । वह अकेला था, भगवान ही उसका भरोसा था । विष के घातक प्रभाव से त्रस्त शरीर इस योग्य नहीं रह गया था कि वह अब इससे काम ले सके । 'ईश्वर तेरी इच्छा पूर्ण हो' - ऐसा कहकर इसने प्रभु का स्मरण किया । चेहरे पर हल्की सी सन्तोष की मुस्कराहट आयी, और वह चल बसा । जो कुछ कर सका उसने किया । वह व्यक्ति था - दयानन्द ।"


- डॉ० स्वामी सत्यप्रकाश सरस्वती


'ऋषि दयानन्द जैसा मैंने समझा', पृष्ठ ४-५


स्वामी दयानंद जी की अर्ध-निर्वाण शताब्दी, ,16 अक्टूबर 1933 अजमेर में इस अवसर पर तत्कालीन सार्वदेशिक सभा के प्रधान महात्मा नारायण स्वामी जी करीब 1 लाख आर्यसमाज की भीड़ के साथ भिणाय की कोठी तक जुलुस में शामिल हुए थे। यह वह स्थान था जहाँ की हिन्दू जाति के परम उद्धारक, वैदिक सभ्यता के प्रचारक ने अपनी इहलीला समाप्त की थी। जो सभ्यता ऋषि को प्यारी थी उसी जाति का एक पुरुष उनकी मृत्यु का कारण था। वह भी क्या अपूर्व समय था, जबकि एक महर्षि इस कोठी में शय्या पर विराजमान थे । मृत्यु समीप थी पर उनको किसी प्रकार का भय न था। उसके चेहरे के ऊपर किसी प्रकार की घबराहट तक न थी। मृत्यु के समय धीर से धीर पुरुष भी विचलित हो जाते हैं। पर योगी ऋषि शांत थे। उन्होंने गायत्री मंत्र का उच्चारण किया, श्वास ली और यह कहते हुए कि "ईश्वर तेरी इच्छा पूर्ण हो" अपने नेत्र बंद कर प्राण त्याग दिए।
महात्मा नारायण स्वामी ने 19 अक्टूबर, 1933 को महर्षि परिचय सम्मलेन में प्रार्थना पढ़ी।
"आज अर्वाचीन आर्यवर्त के सब से बड़े सुधारक ऋषि दयानंद जी का मृत्यु दिवस हैं, प्रभु आप की प्रेरणा से देश में दयानंद जी का प्रादुर्भाव हुआ था, आर्यजाति की दुरावस्था, अनाथों की पुकार, विधवाओं का विलाप, वैदिक धर्म की दुर्दशा,वैदिक सभ्यता का मरणोन्मुख होना, सदाचार का मूल्य घटना, देश का विदेशियों द्वारा पददलित होना आदि ऐसी बातें नहीं थी जो दयानंद जी के जन्म की प्रेरणा का कारण न बनती। प्रभु दयानंद ने जन्म लेकर आपकी प्रेरणा का उद्देश्य समझा, मुनि विरजानंद जी उस उद्देश्य के समझाने के निमित बने, दयानंद जी ने इसी उद्देश्य और प्रभु आपकी इच्छा पूर्तिरुप यज्ञ में अपने जीवन की आहुति दी, यज्ञ से सुघन्धि निकली, कहीं वह अनाथालयों के रूप में दिखाई दी, कहीं विधवा आश्रम, कहीं स्कूल और कॉलेज, कहीं संस्कृत पाठशाला और गुरुकुल, कहीं दलितोद्धार सभा और शुद्धि सभा,कहीं चिकित्सालय और दरिद्रालयों, कहीं कुरीति निवारिणी और स्वराज्य सभा, कहीं मद्यनिवारिणी और व्यायाम प्रचारिणी सभा आदि के रूपों में प्रकट हुई, प्रभु! आज जो हम यह निर्वाण अर्धशताब्दी महोत्सव मना रहे हैं। यह भी उसी आहुति की एक तुच्छ सुगन्धि हैं। ऐसे पवित्र अवसर पर प्रभु! यहाँ एकत्रित हुए हम सहस्त्रों नर-नारी इस सारे चमत्कार को आपकी अपार दया की एक विभूति समझते अपने शिरों
को झुकाते हैं और प्राणी मात्र के उपकार के लिए जो आर्यसमाज का मुख्य उद्देश्य हैं आपके दिए हुए वेदों के शब्दों ही में आपसे प्रार्थना करते हैं। "


यह प्रार्थना मैं जब भी पढ़ता हूँ भावुक हो जाता हूँ क्यूंकि उस एक लाख की भीड़ में प्रार्थना करते समय मेरे पितामह श्री रामकृष्ण आर्य भी शामिल थे। मेरे दादा जी तब केवल 8 वर्ष के थे और वे अपने पिता के साथ अजमेर गए थे। मेरे पितामह जी ने स्वामी दयानंद के दर्शन एवं सत्संग 1878 में रिवाड़ी प्रवास के समय किये थे और तभी से मेरा पूरा परिवार वैदिक धर्मी हैं। डॉ विवेक आर्य


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